Friday, October 19, 2018

तुलसी की खेती एक चमत्कार

आज हम तुलसी की खेती के बारे में जानेंगे क्योकि बाजार में इसकी बढ़ती मांग इसे एक बेहद फायदेमंद एवम लाभदायक बनाती हैं । तुलसी की बड़े पैमाने पर खेती मुख्यतः उ.प्र. ,बिहार, में की जाती हैं ,भारत में तुलसी की ऑसीमम प्रजाति को तेल उत्पादन के लिए उगाया जाता हैं, साथ ही तुलसी का प्रयोग परफ्यूम व कास्मेटिक इंडस्ट्रीज में अधिक होता है इसके अतिरिक्त तुलसी का प्रयोग कई प्रकार की मेडिसिन बनाने में होता हैं क्योकि तुलसी औषधीय गुणों से परिपुर्ण पौधा होता हैं। तुलसी की ओसीमस सेंक्टेम प्रजाति के तेल की अधिक कीमत होती है, किन्तु तेल की मात्रा इससे कम मिलती है।


तुलसी की कुछ प्रजातियां निम्न हैं -

 1.सीमैप
2.सौम्या
3.विकार सुधा
4.श्री तुलसी
5.काली तुलसी
6.कर्पूर तुलसी आदि।

तुलसी की खेती का विस्तार से विवरण निम्न हैं -

1.तुलसी के लिये मिट्टी और जलवायु :

तुलसी के लिए विशेष रूप से अच्छे जल निकास वाली बलुई दोमट मृदा उचित रहती हैं, क्षारीय एवं कम लवणीय मृदा इसके लिए उपयुक्त होती हैं ।
तुलसी की खेती के लिए गर्म जलवायु अच्छी होती हैं यानि की यह ऊष्ण कटिबंधीय एवं कटिबंधीय दोनों जलवायु में हो जाती हैं । तुलसी की फसल पाले के प्रति बहुत ही संवेदनशील अर्थात पाला पड़ने पर यह जल्दी ख़राब हो जाती है।

2.खेत की तैयारी :

   अन्य फसलो की तरह ही तुलसी की अच्छी फसल के लिए भूमि की अच्छी तरह से तैयारी कर लेना चाहिए इसके लिए खेत मे 1 से 2 गहरी जुताई कर देना चाहिये उसके बाद खेत को समतल करने के लिए पाटा और मिट्टी को भुरभुरी करने के लिए रोटावेटर का प्रयोग कर खेत को अच्छे से तैयार कर लेते हैं ।

3.फसल लगाने के लिये पौध तैयार करना :

     पौध लगाने के लिए खेत को 15 से 20 सेंटीमीटर गहरी खुदाई करके उस फील्ड के सारे खरपतवार निकाल देते हैं । 15 टन प्रति हेक्टर की दर से गोवर की अच्छी तरह सड़ी खाद को खेत में मिलाना चाहिए। जमीन से ऊपर उठी हुई 1×1 मी2 की क्यारियां बना देते हैं और उसमे उचित मात्रा में उर्वरक एव कंपोस्ट मिला लेते हैं।
एक हेक्टर क्षेत्र के लिए 750 ग्राम से 1 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता हैं। बीज की बुबाई को 1:10 के अनुपात में करना चाहिए क्योकि तुलसी के बीज बहुत ही छोटे होते हैं अतः हमे 1 किलोग्राम बीज में 10 किलोग्राम तक रेत या बालू मिलाकर 8 से 10 सेंटीमीटर की दूरी पर पक्तियों में करनी चाहिए बीजो को नर्सरी के लिए मिट्टी में 2 सेंटीमीटर की गहराई पर बोना चाहिए । बीज 8 से 12 दिन में उग आते हैं ।जमाव के 15 से 20 दिन बाद 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से नाइट्रोजन डालना उपयोगी रहता हैं।
जब पौधे 4 से 5 पत्तियो के हो जाते हैं तो रोपाई के लिए उपयुक्त होते हैं और लगभग 5 से 6 सप्ताह में नर्सरी रोपाई के लिए तैयार हो जाती हैं।

रोपाई :

         पौधो की रोपाई के लिए शाम का समय सबसे उपयुक्त रहता हैं । रोपाई के बाद खेत मे पानी देना चाहिए ।
लाइन से लाइन के बीच की दूरी 60 से.मी. और पोधे से पौधे की दुरी 20 से 30 से.मी. रखना चाहिए ।

खरपतवार नियंत्रण :

 इसमें खरपतवार के नियंत्रण के लिए खरपतवारनाशी का प्रयोग नहीं करना चाहिए ।इसके लिए पहली निदाई - गुड़ाई रोपाई के 30 से 35 दिन बाद करना चाहिए । दूसरी निदाई - गुड़ाई पहली निराई के 3 से 4 सप्ताह बाद करनी चाहिए।

खाद और उर्वरक :

 तुलसी का प्रयोग औषधि बनाने के लिए किया अतः इसमें रासायनिक उर्वरको का प्रयोग कम/नहीं करना चाहिए ।
गोबर की खाद को 15 टन /हे. की दर से खेत में मिलाना चाहिए , इसके अतिरिक्त 75 - 80 KG नाइट्रोजन, 40 -50 KG नाइट्रोजन और पोटाश की आवश्यकता मात्रा देना चाहिए ।
पहली बार में नाइट्रोजन 1\3 मात्रा तथा फोस्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा दे देते हैं।शेष नाइट्रोजन की मात्रा को दो बार में डालते हैं।

कटाई :

 तुलसी की फसल रोपाई के 10 से 12 सप्ताह में तैयार हो जाती हैं । तुलसी की कटाई फूल आने पर एव नीचे के पत्ते पीले पड़ने पर कर लेनी चाहिए।

उत्पादन : 

तुलसी का औसत उत्पादन 20 से 25 टन /है. की दर से होता हैं।

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