Thursday, October 25, 2018

वर्मीकम्पोस्ट या केंचुआ खाद से करे खेती का कायाकल्प और कमाए लाभ

            केचुआ खाद या वर्मीकम्पोस्ट


परिचय - 

केचुओं को किसान मित्र एवं भूमि का प्राकृतिक हलवाहा भी कहा जाता हैं क्योकि केचुए मिट्टी में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश, के अतिरिक्त मिट्टी में सूक्ष्म पोषक तत्वों की भी पूर्ति करता हैं । इसके द्वारा
सभी प्राथमिक पोषक तत्वों और सूक्ष्म पोषक तत्वों की पूर्ति हो जाती हैं अतः यह एक संतुलित खाद हैं।



केचुओं के द्वारा सडा हुआ गोबर , फसलो के अवशेष ,धान की भूसी एवं अन्य प्रकार के कृषि अवशेष को खाकर अपने मल के रूप में उत्सर्जित किया जाता हैं इसे ही वर्मीकम्पोस्ट या केचुआ खाद कहते हैं। केचुआ खाद सभी पेड़-पोधो के लिए एक बहुत ही लाभदायक एव संतुलित खाद होती हैं जो सभी आवश्यक पोषक तत्वों की पूर्ति कर देती हैं। इसके द्वारा भूमि की उर्वरा शक्ति में वृद्धि होती हैं साथ ही मृदा की जल धारण क्षमता (water holding capacity) में भी वृद्धि होती हैं इसके अतिरिक्त मृदा में सूक्ष्म जीवो की संख्या और गतिविधिओं में सुधार होता हैं जिससे मिट्टी की रासायनिक एव भौतिक दशा में सुधार होता हैं।

केचुआ खाद बनाने की विधि :


केचुआ खाद बनाते समय हमे इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए की गड्डा एक छायादार स्थान पर हो एवं गड्डे को ऐसे ऊँचे स्थान पर बनाना चाहिए जहा पानी न ठहरता हो। बरसात के पानी से बचाने के लिए गड्डे के ऊपर छप्पर लगाना चाहिए।

1. गड्डा या पिट तैयार करना :



केचुआ खाद बनाने के लिए सबसे पहले गड्डा तैयार करते हैं। गड्डे का आकर अपनी सुविधनुसार घटा या बड़ा सकते हैं फिर भी गड्डे को 6 फ़ीट लंबा, 3 फ़ीट चोड़ा और 3 फ़ीट गहरा बनाते हैं। गड्डा बनाने के बाद उसकी तह में वर्मिबेड तैयार करते हैं जिसे केचुआ बिछौना कहते हैं, इसके लिए गड्डे की तली मे 3 - 5 सेमी. मोटी ईट या पत्थर की एक परत बना लेते हैं और उसके ऊपर 3 से 5 सेमी. मोटी रेत की परत बना कर उसके ऊपर साफ कंकर रहित मिट्टी बिछा कर उसे नम कर देते हैं। इस गड्डे में हमें छोटे छोटे छेद भी कर देना चाहिए जिस से वायु का आवागमन पर्याप्त मात्रा में होता रहे ।आजकल बाजार मे तैयार पिट भी मिल जाता हैं।

2.केचुओं के लिए कच्चा माल तैयार करना :


केचुओं खाद बनाने के लिए आधे सड़े हुऐ पदार्थ का प्रयोग करना चाहिए क्योकि केचुए इसे खाना बहुत पसंद करते हैं वैसे सभी प्रकार का मटेरियल प्रयोग कर सकते हैं बस इस बात का ध्यान रखना चाहिए जिस पदार्थ का प्रयोग कर रहे हो उसमे किसी भी प्रकार के कांच,कंकर,पत्थर आदि की उपस्थित न हो।

3.गड्डे को भरना :


वर्मीकम्पोस्ट के गड्डे को भरने के लिए सबसे पहली परत हम फसल/वनस्पति आदि अवशेष की 3 से 4 सेमी. मोटी बनाते हैं फिर अगली परत गोबर की लगाते हैं वह भी 3 से 4 सेमी. मोटी बनाते हैं इस प्रकार गड्डे को पूरी तरह भर लेते हैं साथ ही प्रत्येक परत पर हल्का हल्का पानी छिड़क कर उसे नम करते चलते हैं।सबसे ऊपर की परत के नीचे हम केचुओं का बीज या केचुओं को छोड़ देते हैं तथा गड्डे को अच्छी तरह से ढक कर उसे टाट से ढक देते हैं और समय समय पर उसे नम करते रहते हैं। वर्मीकम्पोस्ट बनाते समय हमें नमी 60℅ तक बनाये रखते हैं और तापमान 20 से 40 डिग्री से. के बीच रखते हैं।

4. केचुओं को छोड़ना :


भारत की जलवायु के अनुसार केचुआ की दो किस्मे सबसे अनुकूल हैं-
1.आइसीनिया फोटिडा
2.यूडिलस यूजिनी
आइसीनिया फोटिडा जिसे रेड वर्म भी कहते हैं,उत्तर भारत के लिए ज्यादा अनुकूल होता हैं। इसका रंग भूरा या बैंगनी होता हैं ,इसकी उत्पादन क्षमता अधिक होती हैं जबकि यूडिलस यूजिनी दक्षिण भारत के लिए ज्यादा अनुकूल होता हैं।
केचुओं के बीज को ऊपरी परत के नीचे वाली परत में छोड़ दिया जाता हैं।


इस प्रकार 2 से 3 महीने में वर्मीकम्पोस्ट बनकर तैयार हो जाती हैं जब वर्मीकम्पोस्ट का रंग चाय की पत्ती की तरह दिखने लगे और उससे किसी प्रकार की कोई बदबू ना आये तो वर्मीकम्पोस्ट बनकर तैयार हो जाती हैं।

वर्मीकम्पोस्ट के लाभ :

1.इसके प्रयोग से मिट्टी की भौतिक एवं रासायनिक दशा में सुधार होता हैं
2.मृदा को जल धारण क्षमता में वृद्वि होती हैं।
3.मृदा में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढती हैं जिससे सूक्ष्म जीवो की क्रियाशीलता बढती हैं।

वर्मीकम्पोस्ट में पोषक तत्वों की मात्रा :


Organic carbon
:
9.5 – 17.98%

Nitrogen             
:
0.5 – 1.50%

Phosphorous
:
0.1 – 0.30%

Potassium
:
0.15 – 0.56%

Sodium
:
0.06 – 0.30%

Calcium and Magnesium
:
22.67 to 47.60 meq/100g

Copper
:
2 – 9.50 mg/ kg

Iron       
:
2 – 9.30 mg/ kg

Zinc
:
5.70 – 11.50 mg/ kg

Sulphur               
:
128 – 548 mg /kg.

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