Friday, March 8, 2019

धान की खेती



परिचय :

पूरे विश्व का 90 % चावल एशिया में उत्पादित होता हैं तथा सबसे अधिक खाया भी एशिया में ही जाता हैं चीन के बाद भारत मे दूसरे नम्बर पर सबसे अधिक चावल का उत्पादन होता हैं इसके साथ ही भारत मे सबसे अधिक खाई जाने वाली अनाज फसल भी चावल हैं।

धान की खेती प्रमुख रूप से दक्षिण एवं उत्तर भारत मे को जाती हैं जिनमे प्रमुख राज्य पंजाब,बिहार,उत्तरप्रदेश,छत्तीसगढ़,
प.बंगाल,म.प्र.,उड़ीसा आदि राज्य हैं।
हरित क्रांति के दौरान खाद्य की कमी को पूरा करने में धान की महत्वपूर्ण भूमिका रही हैं एवं इसी दौरान धान की नई नई किस्में विदेशो से भारत मे लाई गई एवं भारत मे भी कई किस्मो का विकास किया गया ।

धान की खेती मुख्यतः खरीफ अर्थात बरसात की फसल हैं जिसे अधिक पानी की आवश्यकता होती हैं, धान की फसल के लिए लगभग 100 से 150 cm पानी की आवश्यकता होती हैं।

धान की खेती के प्रमुख चरण :

1.जलवायु :

धान की खेती हेतु गर्म एवं नम जलवायु की आवश्यकता होती हैं इसकी खेती के लिए ऑप्टिमम तापमान 30 से 32 डिग्री सेंटीग्रेट होना चाहिए।

2.मृदा का प्रकार :

धान की खेती के लिए क्ले एवं क्ले लोम सबसे उपयुक्त मृदा होती हैं।
धान की खेती के लिए मृदा का पी.एच्. 5.5-6.5 के बीच होना चाहिए अर्थात मृदा अम्लीय होना चाहिए।

3.खेत की तैयारी :

किसी भी फसल की खेती करने से पहले खेत की तैयारी पहला चरण होता हैं।
धान की खेती में खेत तैयारी में प्रमुख कार्य खेत को मचाना या puddling होता हैं यह कार्य एक यंत्र पडलर की मदद से किया जाता हैं,इसका उद्देश्य खेत से होने वाली पानी की हानि को कम करना होता हैं साथ ही इस क्रिया से खेत से खरपतवार को भी कम कर दिया जाता हैं।

4.बीज दर :

1.ब्रॉडकास्टिंग विधि में बीजदर : 100 कि. ग्रा./हैक्टेयर रखते हैं।
2.ड्रिलिंग विधि में बीजदर : 60 कि. ग्रा./हैक्टेयर रखते हैं।
3.हाइब्रिड धान की बीजदर 15 कि. ग्रा./हैक्टेयर होती हैं
4.डेपोग विधि से नर्सरी लगाने के लिए बीज दर 1.5-2 कि. ग्रा./वर्ग मीटर रखते हैं।
5.धान लगने की नई विधि SRI विधि में बीजदर 5-6 कि. ग्रा./हैक्टेयर होती हैं।

4.नर्सरी तैयार करना : 

1.डेपोग विधि :

धान की नर्सरी लगाने की विधि फ़िलीपीन्स से विकसित की गई हैं। इस विधि में रोपनी लगाने हेतु पौध 12 वे दिन तैयार हो जाती हैं। नर्सरी में अंकुरित बीज को लकड़ी के तख्त पर या कांक्रीट की सतह पर 1.5-2 Kg प्रति वर्ग मीटर की दर से फैला दिया जाता हैं । इस विधि में 100 वर्ग मीटर के लिए 500 ग्राम से 1 कि. ग्रा. नाइट्रोजन 500 ग्राम फोस्फोरस एवं पोटाश देना चाहिए।

3.खेत मे पौध का रोपण : 

रोपाई के लिए चावल पौध का उचित समय तब होता हैं जब पौध 4 पत्तियों की हो जाये किन्तु इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि पौध 4 पत्तियों से अधिक नही होनी चाहिए।अतः 3 से 4 पत्तियों युक्त पौधों की रोपाई करनी चाहिए। 
धान की रोपाई का समय :
1.खरीफ में : 21 से 25 दिन बुबाई के बाद।
2.रबी में : 30 से 35 दिन बुबाई के बाद।
3.SRI विधि में : 10 से 12 दिन बुबाई के बाद।
4.डेपोग विधि में : 11 से 14 दिन बुबाई के बाद।

4.उर्वरक प्रबंधन : 

धान की खेत के लिए 250 से 300 कुंटल प्रति हेक्टेयर की दर से गोबर की खाद देना चाहिये।
नाइट्रोजन : 100 कि. ग्रा./हेक्टेयर।
फॉस्फोरस : 60 कि. ग्रा./हेक्टेयर।
पोटाश : 50 कि. ग्रा./हेक्टेयर।
नोट : धान के खेत मे नत्रजन को एक बार मे न देेेकर 2 से 3 डोज में देंना चाहिए।

खरपतवारों का नियंत्रण : 

धान के खेत मे खरपतवार नियंत्रण के लिए निम्न रसायन डालते है -
1.प्रोपानिल(स्टेम f-34) : 3 kg सक्रिय तत्व को 400 से 600 लीटर पानी मे मिलाकर रोपनी के 6 से 8 दिन बाद 1 हेक्टेयर में डालना चाहिए ।(जब खरपतवार 1 से 3 पत्ती के हो जाये।)

2. बूटाक्लोर (मैचेट) : इसके 2 kg  सक्रिय तत्व को अंकुरण से पूर्व एक हेक्टेयर में डालना चाहिए।

3. फ्लूक्लोरालीन (बासालिन) : 1 kg सक्रिय तत्व /हेक्टेयर की दर से पडलिंग के समय या रोपनी के 1 से 3 दिन बाद इसे मिट्टी में मिला दिया जाता हैं।

धान में मुख्यरूप से जंगली धान, सांवा, आदि खरपतवार लगतें हैं।

6.रोग एवं नियंत्रण : 

धान में कई प्रकार के लोग लगते हैं और कुछ पोषण की कमी से हो जाते हैं जैसे -

1.खैरा रोग : 

नर्सरी में होने वाला यह एक प्रमुख रोग है जो कि ज़िंक की कमी के कारण हो जाता हैं अतः ज़िंक की कमी को पूरा करने के लिए ज़िंक सलफेट (ZnSo4) की 25 से 30 Kg मात्रा डालते हैं।


2.ब्लास्ट रोग : 


इस रोग का मुख्य लक्षण होता हैं गर्दन का सड़ना, पत्ती पर बैगनी रंग के आंख या नाव आकार के धब्बे बनना, गाँठो का रंगहीन होना, दाने पूरी तरह न भरना आदि।
नाइट्रोजन की अधिकता,86% से 98% तक वातावरण में आद्रता एवं 20 डिग्री सेंटीग्रेट से कम तापमान इस रोग को बढ़ाबा देता हैं।

रोग का उपचार :

1.Agrosan GN/ceresan/ thiram से बीज को @2g/kg उपचार करना चाहिए।
2.जिनेब या मेंकॉज़ेब का छिड़काव करना।
3.रोग प्रतिरोधी किस्मो को लगाना जैसे -तुलसी,रासी,स्वर्णधान,IR-64, आदि।


3.बैक्टिरियल लीफ ब्लाइट/जीवाणु पत्ती अंगमारी :


इसमे पत्ती टिप से सुखना शुरू करके बेस तक सूख जाती हैं

उपचार :

1. Strepto cycline  + ceresan से बीज उपचार करना चाहिए।
2. 75gm Agrimycin-100 + 500gm copper Oxy chloride को 500 लीटर पानी को प्रति हैक्टर में 3 से 4 छिड़काव करना चाहिए।

2 comments:

Azka Kamil said...

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R.k.Gour said...

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