Friday, July 19, 2019

ड्रैगन फ्रूट की उन्नत खेती/Cultivation of Dragon fruit

नमस्कार दोस्तो आज हम बात करने बाले हैं एक अद्भुत फल की खेती की जी हाँ में बात कर रहा हूं ड्रैगन फल की। तो आइये जानते हैं विस्तार से....

ड्रैगन फल पोषक तत्वों से भरपूर फल हैं जिसकी मांग बढ़ने के कारण इसकी खेती का चलन भारत मे तेजी से बढ़ रहा हैं।
ड्रैगन फल में कई प्रकार के एंटीऑक्सीडेंट पाये जाते हैं ।इसमे आयरन ,मैगनीज़, और फाइबर की भी उपयुक मात्रा होती हैं।



परिचय :

ड्रैगन फ़ल थाइलैंड,वियतनाम, इज़राइल और श्रीलंका में बहुत ही प्रसिद्ध हैं। भारत मे कुछ ही सालो में इसकी खेती का चलन तेजी से बढ़ा है। चूँकि भारत में ड्रैगन फल की मांग का अधिकतम आयात किया जाता हैं जिसके कारण इसकी खेती कर अधिक लाभ कमाया जा सकता हैं। भारतीय बाजारों में ड्रैगन फ़ल 200 रुपये से लेकर 250 रुपये प्रति किलो तक बिकता हैं।
इस फल का प्रयोग सीधे खाने के साथ साथ जैम,जेली,आइस क्रीम, जूस एवं वाइन बनाने में किया जाता हैं।

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ड्रैगन फ़ल के फायदे :

1.डाइबिटीज के रोगियों को यह बहुत फायदेमंद होता हैं।
2.यह कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मददगार होता हैं।
3.इसमें प्रोटीन अधिक मात्रा में होता हैं।
4.इसमे कई प्रकार के एंटीऑक्सीडेंट पाये जाते हैं।
5.यह जोड़ो के दर्द को कम करने में सहायक होता हैं।
6.अस्थमा रोगियों के लिये बहुत ही फायदेमंद होता हैं।
7.यह मिनेरल्स एवं विटामिन्स का अच्छा स्त्रोत होता हैं।
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जलवायु/Climate :

यह उष्ण कटिबंधीय जलवायु वाला फ़ल हैं । इसके उत्पादन के लिए 50 सेंटीमीटर वार्षिक वर्षा एवं 20 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त होता हैं।

मृदा/Soil :

वैसे ड्रैगन फ्रूट सभी प्रकार की मृदा में हो जाता हैं फिर भी इसके लिए sandy loam से clay loam मृदा उपयुक्त होती हैं।
इसके लिए मृदा में जल भराब की समस्या नही होना चाहिए अर्थात जल निकासी का उचित प्रबंध हो।
ड्रैगन फ़ल की खेती के लिए मृदा का पी.एच. मान 5.5 से 7 उपयुक्त होता हैं।
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खेत की तैयारी/Land preparation :

अच्छी तरह खेत जोत कर मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए एवं खरपतवार मुक्त कर लेना चाहिए।
मिट्टी की आवश्यकता अनुसार पर्याप्त मात्रा में कार्बनिक खाद डालना चाहिए। इसके लिये खेत मे 70 से 80 टन प्रति हेक्टर खाद का प्रयोग कर सकते हैं।
ड्रैगन फ़ल को लगाने के लिए गड्डों को 2×2 मीटर की दूरी पर 50×50×50 सेंटीमीटर आकर के गड्डे मई के महीने में खोदकर लगभग 15 दिनों के लिये खुला छोड़ देते हैं ताकि तेज धूप के कारण मृदा के हानिकारक कीट एवं रोगकारक नष्ट हो जाये।

Propagation and planting :

ड्रैगन फ़ल को लगाने के लिये मुख्यतः कटिंग का प्रयोग किया जाता हैं किंतु इसे बीज के द्वारा भी लगाया जा सकता हैं।
बीज से लगाने से ये उगने में कटिंग की अपेक्षा अधिक समय लेता हैं एवं उत्पादन भी अपेक्षाकृत कम मिलता हैं।
इसे लगाने के लिये हम उपयुक्त मातृ पौधे से 20 cm लंबी कटिंग का प्रयोग करते हैं।
कटिंग को मिट्टी,बालू एवं सूखे गोबर  1:1:2 के अनुपात के साथ मिलाकर गड्डो में रोप दिया जाता हैं एवं रोपाई के बाद गड्डो में मिट्टी डालने के साथ साथ कंपोस्ट व 100 gm सुपर फॉस्फेट भी मिलना चाहिए।
कटिंग लगाने के बाद सिंचाई कर देना चाहिए जिससे मिट्टी अच्छी तरह से बैठ जाये।
कटिंग्स को सूर्य की तेज धूप में रखने से बचना चाहिये।
एक एकड़ के खेत में लगभग 1700 पौधे लगाये जाने चाहिए। चूँकि ड्रैगन फल एक वेल की तरह बढ़ता है अतः इन्हें सहारा लकड़ी या कंक्रेट का तख़्त लगाया जाता हैं।
ड्रैगन फ्रूट को जून - जुलाई या फरवरी - मार्च में लगाते हैं।

सिंचाई/Irrigation :

वैसे ड्रैगन फ्रूट को पानी की बहुत कम जरूरत होती हैं फिर भी रोपाई के तुरंत बाद पानी देने के एक सप्ताह बाद एवं गर्मी के मौसम में आवश्यकता अनुसार सिंचाई की जाती हैं।
पानी की उपयोगिता को बढ़ाने के लिए सिंचाई ड्रिप के माध्यम से करना बहूत ही लाभकारी रहता हैं।

खाद एवं उर्वरक/manure and Fertilizer: 

प्रति पौधा 10 से 15 किलो कार्बनिक खाद का प्रयोग एवं इसके बाद 2 किलो प्रति पौधा प्रति वर्ष बढ़ाते जाते हैं। 
रासायनिक उर्वरकों में म्यूरेट ऑफ पोटाश, सुपर फॉस्फेट व यूरिया को 40:90:70 ग्राम प्रति पौधा तथा प्रति वर्ष इसका प्रयोग 220 ग्राम से 1.5 किलो तक बढ़ाते हैं।
फ़ल बनते समय नाइट्रोजन कम मात्रा में एवं पोटाश अधिक मात्रा में डालने से अधिक उत्पादन प्राप्त होता हैं।

कीट एवं रोग/Insect and Disease :

अभी तक ड्रैगन फ़्रूट में कोई प्रमुख रोग या कीट का प्रकोप नही देखा गया हैं।

फूल एवं फलन का समय/Time of floating and Fruit development :

ड्रैगन फ़ल में फूल मई-जून में लगते हैं और अगस्त से दिसंबर तक फ़ल आते हैं। 
ड्रैगन फ्रूट की 5 से 6 बार फल तोड़े जा सकते हैं

उत्पादन/Production :

ड्रैगन फ़ल एक मौसम में 3 से 4 बार फ़ल देता हैं ।प्रति फ़ल का लगभग 300 से 800 ग्राम तक वजन होता हैं।
एक एकड़ में कुल उत्पादन लगभग 5 से 6 टन प्राप्त होता हैं।

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