Friday, August 23, 2019

रोशा घास की खेती

रोशा घास की खेती

भारत का स्थान क्षेत्र एवं उत्पादन में विश्व में प्रथम हैं। किसानों को परम्परागत खेती की तुलना में रोशा घास की खेती अधिक लाभ दिला सकती हैं साथ ही इसे छोटे व सीमांत किसान कम उर्वरक भूमि पर भी सुगमता से उगा सकते हैं। वर्तमान में रोशा घास की खेती,उत्तर प्रदेश, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक,हरियाणा, गुजरात, व मध्यप्रदेश में बड़े पैमाने पर हो रही हैं।

परिचय

भारत में सुगंधित तेल के उत्पादन में रोशा घास के तेल का महत्वपूर्ण स्थान हैं।
रोशा घास जिसे पामारोजा के नाम से भी जानते हैं यह एक बहुवर्षीय सुगंधित घास हैं, इसकी कटाई एक वर्ष में कई बार की जा सकती हैं। पारम्परिक रूप से उगाई जाने वाली फसलों की तुलना में रोशा घास की खेती ज्यादा लाभदायक है। यह कम लागत में अधिक लाभ देने वाली फसल हैं। रोशा घास की फसल एक बार लगाकर इससे 3 से 6 वर्षो तक उपज ली जा सकती हैं साथ ही इसकी खेती भारत के शुष्क प्रदेशो में भी सफलता पूर्वक की जा सकती हैं।

लवायु एवं तापमान 

रोशा घास हेतु गर्म एवं आद्र जलवायु उपयुक्त मानी जाती हैं। तेल की अच्छी मात्रा एवं अच्छी गुणवत्ता के लिए गर्म एवं शुष्क जलवायु बेहतर मानी जाती हैं । 
रोशा घास की फसल 10 ℃ से 45 ℃ तक के ताप को सहन करने में सक्षम होती हैं।

मृदा एवं पी. एच्.

रोशा घास उपजाऊ भूमि से लेकर खराब खेती में भी इसकी खेती की जा सकती हैं। उचित जल निकास वाली मृदाए जिनका पी. एच्. 7.5 से 9.0 तक होता हैं ऐसी मृदाओं में भी रोशा घास की खेती की जा सकती हैं। इसकी खेती शुष्क एवं अर्धशुष्क क्षेत्रों में भी वर्षा आधारित फसल के रूप में भी की जा सकती हैं।

खेत की तैयारी 

रोशा घास की खेती के लिए खेत को अच्छी तरह से जोत कर मिट्टी को भुरभुरी कर लेना चाहिए। खेत को कल्टीवेटर की मदद से कम से कम दो बार जोतना चाहिए साथ ही खेत में गोबर की सड़ी हुईं खाद को 10 से 15 टन प्रति हैक्टर की दर से मिलाना चाहिए।

रोपाई या बुबाई

रोशा घास के पौधों का प्रसारण सीधे जड़दार पौधों, सीधे बीज की बुबाई एवं पहले नर्सरी में पौधें तैयार कर रोपण किया जा सकता हैं। व्यवसायिक खेती के लिए नर्सरी से उनका रोपण करना उपयुक्त माना जाता हैं।
नर्सरी हेतु उठी हुई क्यारियां बनाकर उसमें सड़ी हुई गोबर की खाद या  वर्मीकम्पोस्ट अच्छी तरह मिलाकर उसकी सिंचाई कर दी जाती हैं।
1 हैक्टर खेत की रोपाई हेतु 400 से 500 वर्गमीटर क्षेत्रफल में नर्सरी बनाते हैं, बीज की मात्रा 2.5 किलोग्राम प्रति हैक्टर पर्याप्त होती हैं, बीज को रेत के साथ मिलाकर 15 से 20 सेंटीमीटर की दूरी एवं 1 से 2 सेंटीमीटर की गहराई पर पंक्ति में या नर्सरी में छिटक कर बोना चाहिए।
नर्सरी की लगातार समय समय पर सिंचाई कर नम रखना चाहिए । नर्सरी लगाने का सर्वोत्तम समय अप्रैल से मई में होता हैं। नर्सरी लगभग 4 सप्ताह के बाद खेत में रोपाई के लिये तैयार हो जाती हैं, खेत की रोपाई से पूर्व सिंचाई कर दी जाती हैं एवं नर्सरी को भी नम कर दिया जाता हैं।
नर्सरी के स्वस्थ पौधें उखाड़कर (20 से 25 सेंटीमीटर लंबे) खेत मे 60×30 सेंटीमीटर की दूरी पर रोपाई करना चाहिए। पौधें अधिक लंबे होने पर ऊपर से काट देना चाहिए एवं रोपाई के बाद सिंचाई कर देना चाहिए।

सिंचाई 

सिंचाई की आवश्यकता मौसम पर निर्भर करती हैं। वर्षा ऋतु में सिंचाई की आवश्यकता नही होतीं हैं। सर्दी या शरद ऋतु  के मौसम में 2 सिंचाई पर्याप्त रहती हैं साथ ही गर्मी में 3 से 4 सिंचाई की आवश्यकता होती हैं।
प्रत्येक कटाई के बाद सिंचाई अवश्य करना चाहिए।

उर्वरक 

रोशा घास ग्रेमीनी (घास) परिवार का हैं अतः इसे नाइट्रोजन 150 किलोग्राम, फॉस्फोरस 50 किलोग्राम, पोटास 50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष देना चाहिए एवं 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर देने से उपज में वृद्धि होती हैं। फसल की कटाई बाद में 40 किलोग्राम नाइट्रोजन को 3 भागो में देना चाहिए।
नोट - नाइट्रोजन की आवश्यक मात्रा ही डालना चाहिए क्योंकि नाइट्रोजन की ज्यादा मात्रा हानिकारक हो सकती हैं।

फसल सुरक्षा

रोशा घास एक सहिष्णु फसल हैं, इस पर विशेष कीट एवं रोगो के द्वारा हानि नही होती फिर भी अगर एफिड, थ्रिप्स,व्हाइट ग्रब का प्रकोप होने पर इनके नियंत्रण के लिए रोगर (0.1%) मोनोक्रोटोफॉस कीटनाशी का छिड़काव करना चाहिए।

कटाई का समय

फसल की कटाई जमीन से 15 से 20 सेंटीमीटर ऊपर से पौधे को 50 % फूल की अवस्था आने पर कटाई करना चाहिए। फसल को काटने के बाद एक दिन धूप में सुखाकर या दो दिनो तक छाया में सुखाने के बाद आसवन करने से कम खर्च में अधिक तेल प्राप्त किया जा सकता हैं।
रोशा घास की खेती उपजाऊ भूमि के साथ - साथ कम उपजाऊ ऊसर भूमि, 9 पी. एच्. मान वाली भूमि, कम जल उपलब्ध्ता वाले क्षेत्र एवं यूकेलिप्टस जैसे वृक्षों के मध्य भी सफलता पूर्वक खेती कर सकते हैं।
रोशा घास के सभी भागों जैसे फूल, पत्ती, तथा तना आदि में तेल की मात्रा होती हैं किंतु फूल वाला सिरा तेल का प्रमुख भाग होता हैं। इसके तेल पर विपरीत परिस्थितियों का हानिकारक प्रभाव नही पड़ता हैं।

उन्नत किस्मे

सीएसआईआर-केंद्रीय औषधीय तथा सुगंधित पौधा संस्थान (सीमैप), लखनऊ एवं संबंधित अनुसंधान केंद्र रोशा घास की खेती करने के लिए किसानों की मदद करता है और उन्हें बीज भी उपलब्ध कराता है। रोशा घास की कुछ उन्नतशील किस्मों को सीएसआईआर-सीमैप द्वारा विकसित किया गया है, जिनमे मुख्य प्रजातियाँ पीआरसी-1, तृष्णा, तृप्ता, वैष्णवी और हर्ष है |

उपज एवं कमाई

तेल का प्रतिशत, शाक एवं तेल की उपज जलवायु एवं कृषि कार्य पर निर्भर करता हैं। तेल की पैदावार पहले वर्ष कम एवं उम्र के साथ - साथ इसमें वृद्धि होती हैं।
औसतन रोशा घास में 0.5-0.7% तेल पाया जाता हैं। उचित प्रबंधन में तेल की औसतन उपज 200 से 250 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष प्राप्त की जा सकती हैं। इस प्रकार पहले साल 120,000 से 140,000 रुपये प्रति हेक्टेयर तक शुद्ध लाभ प्राप्त किया जा सकता हैं जो आने वाले सालों में अपेक्षाकृत अधिक हो जाता हैं।

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